
जो पहले छोटी-छोटी बातों में
डर भी जाती थी, हँस भी पड़ती थी,
वही माँ—
बच्चों की हिफ़ाज़त में
हर मुश्किल को अपने सीने से लगा लेती है।
वह कहती है—
“मैं ईश्वर की रचना हूँ,
मैं धरा हूँ, मैं पार्वती हूँ,
ज़रूरत पड़ने पर हर रूप
मैं स्वयं धारण कर लेती हूँ।”
बच्चों की ख़ुशी हो या उनकी हँसी,
सबसे पहले माँ के दिल से ही होकर गुजरती है।
जैसे सूरज की पहली किरण
दीए की बाती को छूते ही
उजाला फैला देती है—
वैसे ही माँ का स्नेह
बच्चों के जीवन को
चमका देता है।
पर जब बच्चों पर
ज़रा-सा भी ख़तरा मंडराता है—
तो वही माँ,
जो छिपकली से भी घबरा जाती थी,
पल भर में काली बन जाती है।
कभी चंडी बन जाती है,
कभी दुर्गा का रूप ले लेती है,
कभी ढाल, कभी तलवार—
बच्चों की रक्षा में
वह हर रूप बन जाती है।
माँ—
वह कोमल भी है,
वह शक्तिमान भी।
वह प्रेम की धारा भी है,
और समय पर
अचल पर्वत-सी हिम्मत भी।
ज्योती कुमारी
नवादा (बिहार)




