साहित्य

उडा़न

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"

महाभारत में एक शिक्षा प्रद कथानक है कि-
दक्षिण सागर तट पर मान सरोवर के हंँसों का एक
परिवार प्रवास कर रहा था, वे प्रवास काल की समाप्ति पर अपने मातृ देश के लिए सह प्रयाण करने की सोच ही रहे थे कि तट पर ही संग संग विचरण करने वाला एक कौआ हंँस के पास आया और पूछ पडा़ कि-हे सुपर्णी!आप कितने प्रकार की उडा़न जानते हैं? हंँस ने स्मित हास के साथ कहा कि- हे
श्याम वर्णी मैं तो मात्र एक ही प्रकार की उडा़न जानता हूँ- “एकल समरस उडा़न”। कौआ का अहंकारी मन शांत न रह सका,उसने कहा कि मैं तो शताधिक उडा़न जानता हूँ,क्या आप अपना जीवन
सार्थक समझते हैं? हँस मौन रख कर अपने गंतव्य की ओर उड़ चला।अशांत मन कौआ भी संग संग उडा़न भरने लगा तथा एक एक करके समस्त प्रकार
की उडा़नों का प्रदर्शन कर इसे नामकरण से इंगित करने लगा। उडा़न भरते हुए वह समुन्द्र तट से कई योजन दूर सागर के मध्य में चला आया।उसे अब वापसी की चिंता हुयी। इसके पूर्व कि वह सागर तट तक वापस आ पाता,अपने कृत श्रम से वह थक चुका था,उसके पंख क्लांत हो चुके थे,वह सागर की
लहरों में उलोडित विलोडित होने लगा। उसकी दयनीय स्थित एवं उसे मृत्यु को प्राप्त होता हुआ देख,हँस ने उसे चोंच से पकड़ पीठ पर बैठा सुरक्षित
सागर तट पर पहुँचा कर कहा कि -हे उडयन प्रवर! उडा़न वही सार्थक है, जो जीवन पर्यन्त साथ दे।”
“जो अहं के शिखर पर चढ़ते हैं,वे मतिमंद गिर पड़ते हैं,आर्त हो प्रभू को पुकारने पर ही,उसकी कृपा से उठ पाते हैं।”
(अपनी पुस्तक उडा़न से उद्धृत)
✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन” गोरखपुर
चलभाष-९३०५९८८२५२

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