साहित्य

विलुप्ल होती मैं

अक्षय महोदिया

हॅू विलुप्त जा रही शनैः शनैः मैं।
रोक लो , थाम लो , न जाने दो इस दौर से
पढ लो एक बार फिर से उसी रस से
हो आत्मा तृप्त जब तक ना हो मन में जस

मैं पंक्तियाa हॅू , कविता हॅू और मैं हॅूं कहानी
गद्य हॅू, पद्य हॅूं और हॅूं किसी की जबानी
रोक लो , थाम लो न जाने दो
फिर न जाउगीं इस जहां मे मैं

गुम हो गई हॅू , पत्र पत्रिकाओं से और अखबारों से
पुस्तकों से नए सिलेबसों से
कोई सुध लेता नहीं मेरी ,न कोई परवाह नहीं
अब तो कबाडी वाले के पास भी न मिलती मैं
ना ही नुक्खड वाली दुकान पर

रह गई हॅू एक अपिठत सी, पलायन सी, बेजान सी
कोई तो पढ लो जीवनी संस्मरण , क्या इतनी भी ना स्मरण।

छंद हॅूं , गीत हॅूं गायन की आत्मा मेैं
तुम मे ,उस में इस मे और परमात्मा में मैं
लिख दो , पढ लो, या फिर सुन लो
इस दुनिया से विलुप्त होती मैं ,कोई तो रोकों
हॅू विलुप्त जा रही शनेःशने मैं।
रोक लो , थाम लो, न जाने दो इस दौर से
अक्षय महोदिया
झाबुआ म.प्र.

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