
वो माँ का कोरा कागज़ देना और मोम वाले रंग,
मेरा फूल बनाना और दुनिया जीतना उनके संग।
“देखो कैसा बना है!” मेरा वो शोर मचाना,
सबके चेहरे की मुस्कान देख, अपना खुश हो जाना।
कांच की बोतल में सजा वो रंगीन भूगोल था,
सादा सा कागज़, पर एहसास अनमोल था।
दिवाली की सफाई में जब टूटती थीं पत्तियाँ,
फिर से गुलदस्ता बुनती थीं मेरी नन्हीं सी सखियाँ।
असली फूल तो दो दिन में मुरझा ही जाते हैं,
पर कागज़ के ये फूल सालों साथ निभाते हैं।
मम्मी-पापा की सालगिरह पर फिर वही जादू जगाऊँगी,
इस बार कागज़ों से मैं अपनी पूरी जान लगाऊँगी।
कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)




