
गले में बंधा एक छोटा सा धागा,
और उसमें लटका ताबीज,
क्या सच में बदलता किस्मत की डोर
या बस दिल को दिलासा देता है?
मंत्र, आयत या कोई प्रतीक,
कागज़ में लिपटे कुछ अक्षर,
क्या बदलते हैं हवाओं का रुख,
या बदलते मन के भीतर का डर?
माना कलाई पर बंधा काला धागा,
माँ की दुआओं की तरह होता है,
जिसमें शायद शक्ति नहीं पर विश्वास होता,
और वही विश्वास सबसे बड़ा कवच होता है। यह
ताबीज,
मात्र धातु नहीं, एक भावना है,
मात्र शक्ति नहीं, एक आशा है,
जो इंसान अपने भीतर खोज नहीं पाता,
उसे बाहर किसी ताबीज में पाता है।
कुछ इसे कहते आस्था और कुछ अंधविश्वास,
पर सच तो यह है,
हर ताबीज में बंधी होती है
मनुष्य की असुरक्षा और उम्मीद की आस।
शायद कभी यह रक्षा करता,
शायद कभी सिर्फ भ्रम देता है,
पर हर बार ताबीज पूछता है,
क्या अपने से ज़्यादा तुम्हें,मुझ पर भरोसा है?
स्वरचित मौलिक रचना
सुमन बिष्ट, नोएडा




