साहित्य

आदमी में ही

फ़ैज़ अहमद'मीम'

आदमी में ही कोई इंसान है
तो कोई ज़ालिम कोई हैवान है

खून के रिश्ते पराये हो गए
दिल मिरा इस बात पे हैरान है

सबको जाना है जहाँ से लौट कर
इस ज़मीं पर हर कोई मेहमान है

बस दिखावे की लबों पर है हँसी
हर किसी का दिल मगर वीरान है

जो ये तिल है शो’ला ए रुख़सार पे
ये तुम्हारे हुस्न का दरबान है

रहनुमाई में तिरी सब कुछ मिरा
मेरे रब तेरा बहुत एहसान है

बेक़रारी हर घड़ी दिल में रहे
दिल लगाने का यही नुक़सान है

बंदगी को ‘मीम’ तुम मत छोड़ना
रब के सजदों में ही इत्मीनान है
फ़ैज़ अहमद’मीम’
आरा,बिहार

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