
दर्पण तुझसे पूछती, कैसा हो . श्रृंगार।
आने को हैं साजना, पहनुँ कैसा हार।।
कैसे मैं जूड़ा करुं, कैसे रंग लूँ गाल।
समझ अभी आता नहीं, मैं कैसे रक्खूं बाल।
मेरा दिल धक – धक करे , क्या दूँगीं उपहार।
आने को हैं साजना, कौन सा पहनुँ हार।
कैसे मैं कजरा करुं,कैसे बिन्दी साज।
रचूॅ महावर किस तरह, आती मुझको लाज।
खन खन खनके चूड़ियाँ , आयी आज बहार।
आने को हैं साजना, कौन सा पहनुँ हार।।
चीर घाँघरा लूँ पहन , या सलवार कमीज।
जल्दी से दर्पण बता, मेरे तुम्हीं अजीज।
अब न करना देर मुझे, होना है तैयार।
आने को हैं साजना, पहनुँ कैसा हार।।
मुस्कायी दर्पण सखी, बोली मीठी बात।
कुछ भी पहनो आज तुम , होगा नेह प्रभात ।
सुंदर प्यारी हो सखी, करना आज विहार ।
आने को हैं साजना, पहनुँ कैसा हार।।
रचना मिश्रा “रूही”
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