
किसी शाम ज़िन्दगी ने दस्तक दी
किसी शाम हम ज़ार-ज़ार रोए!!
वफ़ा का उनसे वादा तो नहीं था
ऐसे मिले वह हमसे की जुदा ना हुए!!
तमाम रात तेरी याद ही में कट गई
हम पर फ़रेब कुछ इस तरह हुए!!
लेकर वह ज़िन्दगी ना जाने कहाँ गया
हम उनकी महफ़िल के कई बार हुए!!
कभी बेबसी के साथ उनसे बातें की
कभी वह मेरे ग़म में शामिल हुए!!
दोस्ती हक़ से ना निभाई थी उसने
जब भी हुए झगड़े इसी बात पर हुए!!
ज़्यादा दौलत ख़ुदा किसी को ना दे
अक्सर सारे फ़साद इसी बात पर हुए!!
ग़ुरूर में उनका दिल पत्थर हो गया
यूँ बिछड़ने के धोखे हमें बार-बार हुए!!
उम्र गुज़र गई कुछ भी ना हासिल हुआ
दिल तोड़ने के ज़िक्र बार-बार हुए!!
वह आएंगे तो उनसे पूछेंगे जरूर
रिश्ते हमें छोड़कर कितने आसान हुए…!
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




