
अगर खामोशी लिखती, तो लिखती उस पुरुष के बारे में,
जिसे बचपन से ही ‘त्याग’ का पाठ पढ़ाया गया।
“दे दो बेटा, छोटी बहन रो रही है ना…”
यहीं से उसकी इच्छाओं का गला दबाया गया।
अगर खामोशी लिखती, तो स्कूल की उन तस्वीरों को बोलती,
जहाँ १०वीं के फोटो-शूट में वो सबसे पीछे खड़ा मिलता है।
जीत का सेहरा अक्सर लड़कियों के सिर बँधता,
और वो लड़का भीड़ में कहीं गुम सा दिखता है।
अगर खामोशी लिखती, तो बयां करती शादी का वो शोर,
जहाँ रिसेप्शन के सारे तोहफे नई दुल्हन के नाम होते हैं।
दूल्हा खड़ा रहता है एक सजे हुए पुतले सा,
सबकी दुआएं, सबके उपहार बस ‘उसके’ (स्त्री) लिए होते हैं।
२५वीं सालगिरह पर भी वही गूँज सुनाई दी,
“ये मंगलसूत्र सास माँ ने दी , ये झुमके माँ की दी है।”
पर उस पुरुष के खाली हाथों को किसी ने न देखा,
जिसने उम्र भर सिर्फ अपनी जिम्मेदारियां निभाई हैं।
पुरुष की खामोशी आखिर किसी को समझ क्यों नहीं आती?
क्या उसे चोट नहीं लगती? क्या उसका दिल नहीं टूटता?
थकता वो भी है, टूटता वो भी है भीतर तक,
बस फर्क इतना है, वो सरेआम नहीं रोता।
कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)



