
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।
प्यार का अनुपम संदेश अपनाओ।
बेटी का भ्रूण हत्या है पाप,
यह है जघन्य अपराध।
यह समाज को कलुषित कर,
बना निरर्थक अभिशाप।
बेटी…
प्यार…
बेटी पढ़कर करती है,
समाज का कल्याण।
यह दो वंशों को जोड़कर,
बनाती है अपनी पहचान।
बेटी…
प्यार…
बेटी समाज की सेवा कर,
उसे बनाती है महान।
यह अरमानों को पूरी कर,
राष्ट्र के लिए बनी है वरदान।
बेटी…
प्यार…
यह बच्चों में संस्कार देती,
बच्चे बन जाते नेक इंसान।
वे अपनी मां के कर्जों को चुकाकर,
बनना चाहती है सामर्थ्यवान।
बेटी…
प्यार…
बेटी बहन रूप है,
भाई का प्यारा।
बेटी मां का रूप है,
बेटी के लिए जग सारा।
बेटी…
प्यार…
बेटी दुर्गा, काली हो
या हो सरस्वती।
सभी रूप पूजनीया हैं,
हमसब उतारें उनकी आरती।
बेटी…
प्यार…
दुर्गेश मोहन
बिहटा, पटना (बिहार)




