साहित्य

दो सहेलियों का मधुर मिलन (हास्य-व्यंग्य)

जयचन्द प्रजापति 'जय'

गीता और सीता दो सहेली थी। दोनों में मधुर संबंध था। दोनों बहुत दिनों के बाद मिली थी। दोनों ऐसे मिली थी जैसे चींटे को गुड़ की भेली मिली थी। एक दूसरे से लिपट-लिपट कर गले मिल रही थी क्योंकि दोनों कई सालों के बाद मिली थी।

दोनों बचपन में एक साथ पढ़ी लिखी थी। चोट गीता को लगती तड़प सीता को होती। एक ही थाली में खाने जैसा बर्ताव रहता था। अब दोनों की शादी हो गयी है। दोनों घर गृहस्थी में रम चुकी हैं।

गीता अपने ससुराल में बहुत खुश है। गीता कहती है। पति हमारा बहुत भोला है। सरलता से भरा है। जो मंगाओ बेचारे सब ला देते हैं। मैंने चांदी का झुमका कहा था,कि ला दो। इतना भोलापन है कि सोने का झुमका बनवा दिया।

सच कहूं वे इतने भोले हैं सोने की अंगूठी कह दी तो पीतल की अंगूठी बनवा दी। सोने जैसा ही पीला है पीतल। पीतल सस्ते में मिल गया।

इन्ही सब में हंस बोलकर जिंदगी गुजर रही है। सासु तो देशी घी की तरह है। चाहे तो रोटी में लपेटकर खा जाओ। गाय की तरह बहुत सीधी हैं। बच्चों से घर में कोलाहल बना रहता है। घर में सूनापन नहीं है।

सीता ये सब सुनकर बेचारी का मुंह लटक गया। अपना नसीब तो खोटा है। पति दो पौवा रोज लेता है। घर गृहस्थी में आग लगी रहती है। कभी नून नहीं तो कभी तेल नहीं। जिंदगी कांव-कांव सी हो गयी है। मेरे घर में रोज लड़ाई झगड़े का कोलाहल बना रहता है।

सासु तो दिनभर गाली बकती रहती है। चैन नहीं है। उब गयी हूँ‌। घर गृहस्थी का बोझ बहुत‌ बड़ा सा लगता है। सोंचती हूँ। आत्महत्या कर लूँ। पर इनको दो रोटी कौन देगा।

सोंचती हूँ। सासु कितने दिन जिंदा रहेंगी। इसलिये सब सहती हूँ। एक दिन उनकी मौत की डोली उठ ही जायेगी। घरेलू कलह से छुट्टी मिल जायेगी। सीता की कहानी सुनकर बेचारी गीता के आंसू नहीं रूक रहे है‌। सीता गीता के आंसू को पोंछने लगी।

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जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

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