साहित्य

दरबार

उदय किशोर साह

चोरों के दरबार में चोर ही  बना चोकीदार
गीध दृष्टि लगी हुई है मंच  पे बैठा सरदार
लाज शर्म की नहीं गतर में कोई सरोकार
एक ही रंग में रंगा हुआ है कुत्ते  व सियार

लोक लुभावन सपनों की लगी झूठा कतार
आते जाते राही पे करता पीछे से        वार
निकल चलो होशियारी से जालिम है बाजार
लुट ख्रसोट की सज ग्ई यहाँ    पे नई संसार

टोह  के लिये कहता पाकेट मार से होशियार
मूरख जनता भूल से टटोलता पाकेट का द्वार
चोरों की पैनी नजर करता है   सब का दीदार
आपकी पाकेट  पे है करता शातिराना    वार

आपकी पसीने की कमाई से इनको है प्यार
बुला बुला कर ये जालिम करते   है  सत्कार
पलक पावड़े बिछा  करते  आपकी इन्तजार
हाथ  की सफाई में  माहिर इनका है कारोबार

मत पड़ना इन जुल्मी के चक्कर में ओ मेरे यार
वर्ना रोना ही होता है इनके जुल्म की     प्रहार
सकरी गली से निकल पड़ो ना देखो वो    द्वार
जहाँ लगी है इन चोरों की ऐसी मीना   बाजार

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार

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