
सृष्टि और सृष्टा में से किसकी पूजा करना और किसकी पूजा नहीं करना?इन दोनों में से किसको जानना और किसको नहीं जानना?जो मजहब, संप्रदाय और रिलीजन सृष्टि की उपेक्षा करके सृष्टा को ही सर्वोपरि मानकर चलते हैं, उन्होंने दुनिया में बहुत अधिक अशांति, उपदेश, हिंसा और युद्धों को बढ़ावा दिया है। वैसे ऐसा होना नहीं चाहिये, लेकिन हुआ तो है। यदि सृष्टा को सब कुछ मानने की बात खुद तक ही सीमित रहती तो कोई समस्या नहीं थी। लेकिन इन्होंने तो दुनिया को जबरदस्ती से मनवाना शुरू कर दिया। वैचारिक स्वतन्त्रता को समाप्त करके यह सब किया गया था और अब भी किया जा रहा है। नेताओं, धर्माचार्यों, सुधारकों, कथाकारों, उच्च -अधिकारियों, न्यायधीशों और शिक्षकों के अंतर्मन में स्वयं को सृष्टा मानकर जनमानस को असहाय,दास और गुलाम मानने की प्रवृत्ति हावी हो गई है।यह तानाशाही है।यह जोर- जबरदस्ती है।यह मनमानापन है।यह वैचारिक स्वतन्त्रता का गला घोंटने जैसा है।यह सृष्टि यानी जनमानस के जीवन जीने के मूलभूत अधिकार को छीन लेना है।
लोकतंत्र में एक वैचारिक संकट है,जिसका समाधान आज तक संभव नहीं हो पाया है। कहते हैं कि लोकतंत्र में असहमति को स्थान होता है लेकिन वह स्थान कहीं पर दिखाई नहीं दे रहा है। सत्ताधारी दल अपनी नाकामियों को छिपाने के लिये असहमति को देशद्रोह कहने लगता है। कुछ भी करके उसे सत्ता में बने रहने के लिये यह करना सही लगता है। लेकिन सच यह भी है कि कयी बार असहमति की आवाज उठाने वाले दल और उनके नेता वास्तव में देशद्रोही गतिविधियों तक चले जाते हैं।उनकी सत्ता प्राप्त करने की चाह उन्हें यह करने को विवश कर देती है। लेकिन सत्ताधारी दल को अपनी सत्ता बचानी है, जबकि विपक्षी दलों को खोई हुई सत्ता प्राप्त करना है। दोनों की इस खींचातानी में राष्ट् कमजोर होता है तो राष्ट्रवासी बदहाल होते जाते हैं। भारत में भी कुछ ऐसा ही चल रहा है। यूरोप, अमरीका आदि में भी यह खींचातानी मौजूद है लेकिन भारत से मात्रा में यह बहुत कम है। इसलिये वो देश भौतिक तरक्की अच्छी करने में सफल हो रहे हैं।उनका लोकतंत्र उनकी जमीन और जरुरत अनुसार है, जबकि भारत का लोकतंत्र पश्चिम की अंधी नकल है। पश्चिमी लोकतंत्र अधिक पुराना नहीं है। हालांकि वो इसे युनान आदि से जोड़कर पुराना सिद्ध करने की कोशिश करते हैं।बेशक पुराना सिद्ध हो जाये लेकिन फिर भी उनकी लोकतांत्रिक व्यवस्था भारत के अनुकूल नहीं है। भारत के लिये अपना खुद की जमीन पर जन्मा हजारों वर्षों पुराना लोकतांत्रिक ढांचा मौजूद है, जिसके बीज आप जमीनी लोकतंत्र के रूप में तीन हजार,पांच हजार,दस हजार वर्षों पहले भी देख सकते हैं।बस, पश्चिमी चश्मे से भारत को देखना बंद करना पड़ेगा।
लोकतंत्र में असहमति को स्थान देने के मामले में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही भ्रमित और सत्ता पिपासु लगते हैं। दोनों के लिये राष्ट्र, राष्ट्रहित और लोकतंत्र से अधिक महत्वपूर्ण अपनी भ्रष्ट सत्ता और अपने प्रभाव को कायम रखना है। लेकिन फिर भी लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी सत्तापक्ष की ही अधिक होती है।सत्ता का अंधमोह छोड़कर राष्ट्रहित में वह आदर्श प्रतिमान प्रस्तुत करे- यह उसकी जिम्मेदारी है। लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो रहा है। सत्तापक्ष के पास सत्यनिष्ठ, पुरुषार्थी, मेहनतकश, राष्ट्रभक्त और भारतीय जीवन और आवश्यकताओं से सुपरिचित और शिक्षित नेताओं की बेहद कमी है।इस कमी को कैसे पूरा किया जाये – इसकी तरफ उसका कोई ध्यान नहीं दिया है।बस कुछ भी करके सत्ता चाहिये। सत्ता है तो धन, दौलत, शक्ति,पद और प्रतिष्ठा अपने आप चले आते हैं। इसके लिये भ्रष्टाचार,छल,कपट, धोखाधड़ी, अत्याचार आदि सब कुछ जायज है। विरोध या असहमति की आवाज को दबाने के लिये उसके पास सभी साधन मौजूद हैं।फौज, पुलिस, अधिकारी, न्यायाधीश,प्रैस और सोशल मीडिया आदि सब कुछ को अपनी नाकामियों और विफलताओं की छिपाने के लिये प्रयोग करके सत्ता को तो कायम यखा जा सकता है लेकिन राष्ट्र कमजोर होता जायेगा और राष्ट्रवासी गरीब,बदहाल और बेरोजगार होते जायेंगे।इस पूरी भ्रष्ट प्रणाली पर पर्दा डालने के लिये जनमानस की तार्किक,वैचारिक, बौद्धिक शक्ति को क्षीण करने के आयोजन करने पड़ते हैं।बस,इसी से भारत में पिछले कयी दशकों से एक गंभीर और विनाशकारी वैचारिक संकट पैदा हो गया है।
हम कभी अमरीका की तरफ भागते हैं, कभी रुस की तरफ भागते हैं, कभी इंग्लैंड की तरफ भागते हैं तो कभी इजरायल की तरफ भागते हैं। लेकिन अपने स्वयं की भूमि की पहचान नहीं कर रहे हैं। चीन ने अपनी भूमि, अपनी प्रतिभा और आवश्यकताओं की पहचान की है,तो चीन आज आत्मनिर्भर है तथा अमरीका, रुस आदि महाशक्तियों को टक्कर दे रहा है। भारत पिछले सात दशक से अंधी नकल करने में लगा रहा है। शिक्षा,स्वास्थ्य, चिकित्सा, विज्ञान,तकनीक,खेती-बाड़ी,सुरक्षा जीवन-शैली आदि के क्षेत्रों में भारतीय राजनीतिक दलों और नेताओं ने भारतभूमि की पहचान करने के प्रयास ही नहीं किये हैं। इनके लिये भारत की समस्यायों का समाधान भारत में नहीं होकर विदेशों में मौजूद है।हर स्तर और क्षेत्र में अंधी नकल चल रही है।इस अंधी नकल के चक्कर में पड़ जाने के कारण भारत ने घर का रहा,न घाट का रहा है। यह निश्चित है कि कोई अन्य देश भारत की मदद अपनी निज शर्तों और हित को देखकर करेगा। सभी अपना लाभ देखते हैं।यूरोप, अमरीका, रुस,इजरायल आदि भी सर्वप्रथम अपने हित को देखते हैं।और ऊपर से वो ठहरे निरे भौतिकवादी देश – वो किन्हीं वैश्विक नैतिक मानवीय मूल्यों को नहीं मानते हैं। अपने हित साधन के लिये वो किन्हीं भी नियमों, मर्यादाओं और मूल्यों को छोड़ सकते हैं। अमरीका को ही देख लो, कैसे अपने हित के लिये वह भारत पर ताबड़तोड़ शर्तें लाद रहा है। और रीढ़विहीन भारतीय नेता उनके बनाये जाल में ऐसे उलझे हुये हैं कि ये चूं भी नहीं कर सकते हैं। दूसरे देशों का अंधानुकरण करना छोड़कर जब तक हम शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, विज्ञान , तकनीक , खेती-बाड़ी, शिक्षा आदि में अपना स्वयं का मजबूत ढांचा विकसित नहीं करते हैं तब तक ऐसे ही युरोप, अमरीका,रुस, इजरायल आदि की गुलामी करते रहेंगे तथा हमारी सीमाएं असुरक्षित रहेंगी,हम गरीब बने रहेंगे,हम आयातित जहर को खाकर अपने देशवासियों का स्वास्थ्य खराब करते रहेंगे।
लोकतंत्र में मौजूद असहमति की आवाज को आधार बनाकर सत्तापक्ष की कमियों, उसके भ्रष्टाचार तथा उसके अन्याय को उजागर करना विपक्ष का राजनीतिक धर्म है।इसे वेद, रामायण, महाभारत और मनुस्मृति आदि ग्रंथों में राजधर्म कहा गया है। सत्तापक्ष राष्ट्रीय प्रगति के लिये अपने राजधर्म का पालन करें तथा विपक्ष सत्तापक्ष की नाकामियों, कमियों और भ्रष्टाचार को उजागर करके विपक्षी राजधर्म का पालन करे -राष्ट्र की खुशहाली के लिये यह अति आवश्यक है। लेकिन यह राजधर्म सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों से गायब है।विपक्ष को अपने राजधर्म का पालन करने से सत्तापक्ष रोक सकता है और इस समय रोका भी जा रहा है लेकिन सत्तापक्ष को अपना राजधर्म निभाने से कौन रोक रहा है? शायद कोई नहीं रोक रहा है अपितु सत्तापक्ष के पास राजधर्म के निर्वहन की योग्यता, मानसिकता और इच्छाशक्ति ही नहीं है। सत्तापक्ष के नेताओं की शिक्षा,दीक्षा,परीक्षा और उनका परिवेश ही राष्ट्रहित का समर्थक नहीं है। उनकी ऐसी कोई राष्ट्र -दृष्टि या उनका ऐसा कोई राष्ट्र -दर्शन या राष्ट्र चिंतन ही नहीं है कि जिससे वो अपने राष्ट्रधर्म का पालन भलि तरह से कर सकें। मेहनतकश, पुरुषार्थी, खेती-बाड़ी, किसान और मजदूर तथा राष्ट्र प्रहरी सैनिक का हित इनके लिये बहुत कम महत्व रखते हैं, जबकि गिने -चुने उद्योगपति, पूंजीपति,कोरपोरेट्स, बहुराष्ट्रीय कंपनियां,नकली धर्माचार्य ,सुधारक कि आदि इनके लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं। वास्तव में यह व्यवस्था लोकतंत्र नहीं है।यह व्यवस्था तानाशाही,राजशाही,कुलीनशाही, लोकशाही की मिली जुली एक खिचड़ी है, जिसके सेवन से भारत के दस प्रतिशत लोग तथा यूरोपीय देश, अमरीका,रुस, इजरायल आदि मजबूत हो रहे हैं तथा भारत के बाकी लोग बर्बाद होते जा रहे हैं।
सत्तापक्ष से असहमति का उत्तर देने में असमर्थ होने पर राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति में छिपकर स्वयं की रक्षा करना सत्तापक्ष का एक पुराना ढंग रहा है -इतिहास इसका साक्षी है। अधिकांश देशों में यह होता आया है।जिन नेताओं में थोड़ी बहुत शर्म,हया, जिम्मेदारी, नैतिकता की भावना होती है,वो अपनी ग़लती को स्वीकार करने में हिचक नहीं करते। लेकिन दुनिया का राजनीतिक इतिहास ऐसा नहीं रहा है। राजनीति लगभग बुराई, अनैतिकता, पाखंड, ढोंग, भ्रष्टाचार, बदले की भावना और अपनी नाकामियों को छिपाने का पर्याय शुरू से ही रही है। राजनीतिक दल या नेता कोई भी हो। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों एक ही पोटली के कंकड़-पत्थर रहते आये हैं। राष्ट्रवाद, राष्ट्रभक्ति, स्वदेशी, स्वदेश प्रेम आदि भावनाएं बुरी नहीं हैं। लेकिन इनका अधिकांशतः दुरुपयोग अधिक हुआ है।इनकी आड़ में नाकामियों, विफलताओं, बेवकूफियों और मूर्खताओं को छिपाने का इतिहास रहा है। भारत पिछले सात दशक से इसका सर्वाधिक ग्रस्त रहा है। लेकिन वर्तमान में इसकी अति होते दिखाई दे रही है।यह शुभ संकेत नहीं है। इससे जनमानस की मूलभूत समस्याएं अनसूलझी रह रही हैं। जनता की जान सस्ती और राजा की मस्ती – कहावत सार्थक होती लग रही है।जिस राजा को राष्ट्र सेवा के लिये चिंतित होना चाहिये,वह राजा यदि अपनी पोशाक, जूते, केश सज्जा, चश्मे, घड़ी,यात्राओं, सुरक्षा, हावभाव,नोटंकी, नाटकबाजी पर अरबों रुपए खर्च करना शुरू कर दे,तो वह राष्ट्र कभी भी तरक्की नहीं कर सकता।उस राष्ट्र का जनमानस कभी भी खुशहाल नहीं हो सकता। साहित्यकार हरिश्चंद्र की रचना की ये पंक्तियां हमारे राजनीतिक परिवेश पर लागू हो रही हैं -‘अंधेर नगरी चौपट राजा,टके सेर भाजी टके सेर खाजा’।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र-136119




