ईद-उल-फ़ित्र, की असल रूह और ख़ूबसूरती रिश्तों की क़द्र करने में है डॉ . मुश्ताक़ अहमद शाह

ईद-उल-फ़ित्र महज़ एक त्यौहार नहीं, बल्कि यह परवरदिगार-ए-आलम की तरफ़ से अपने बंदों के लिए एक अज़ीम ईनाम है, जो रमज़ान-उल-मुबारक के पूरे महीने की इबादतों, रियाज़तों और सब्र-ओ-ज़ब्त के बाद अता किया जाता है। इस्लाम में ईद मनाने का असल मक़सद उस रूहानी कामयाबी का जश्न मनाना है, जो एक मोमिन ने भूख, प्यास और नफ़्स पर क़ाबू पाकर हासिल की होती है, यह शुक्रगुज़ारी का वह दिन है जब बंदा अपने रब के हुज़ूर सजदा-रेज़ होकर इस बात का शुक्र अदा करता है कि उसे नेकियां करने की तौफ़ीक़ मिली। लेकिन इस मुक़द्दस दिन की रूहानी अहमियत के साथ-साथ इसका एक इंसानी और जज़्बाती पहलू भी है, जो वक्त की गर्दिश के साथ अपनी रंगत बदलता रहता है, क्योंकि हक़ीक़त यही है कि “हर ईद एक जैसी नहीं होती।” कभी यह दिन मसर्रत की उस चोटी पर होता है जहाँ घर के हर कोने में अपनों के कहकहे गूँजते हैं, दस्तरखानों पर पकवानों की महक के साथ अपनों का साथ रूह को सरशार कर देता है, और इंसान का दिल पूरी तरह मुतमईन होता है कि उसकी क़ायनात उसके पास है। मगर वक्त की बेरुख़ी और हालात की तब्दीली इंसान को एक ऐसे मोड़ पर ले आती है जहाँ वही ईद जो कभी सबसे ज़्यादा खुशी का सबब थी, अब महज़ एक खामोशी और तन्हाई के लिबास में लिपटी हुई महसूस होती है। लोग बदल जाते हैं, कुछ मौत की आग़ोश में सो जाते हैं तो कुछ ज़िंदगी की जद्दोजहद में दूर निकल जाते हैं, और पीछे रह जाती है तो सिर्फ वह कसक जो नए कपड़ों और महफ़िलों के बीच भी दिल को तड़पाती रहती है। यह ‘हजूम में तन्हाई’ का वह अलमिया है जहाँ इंसान दुनिया को तो मुस्कुरा कर ईद मुबारक कहता है, मगर उसके अंदर का खालीपन उसे गुज़रे हुए उन लम्हों की याद दिलाता है जो अब कभी लौटकर नहीं आएंगे। ईद की असल रूह और खूबसूरती उन रिश्तों की क़द्र करने में है जो अभी हमारे पास हैं, क्योंकि गुज़रा हुआ वक्त और बिछड़े हुए लोग सिर्फ़ यादों के झरोखों में ही ज़िंदा रहते हैं, और इंसान का दिल अक्सर भरी महफिल में भी किसी एक शख़्स की कमी को शिद्दत से महसूस करता है। इसी क़ैफ़ियत और ईद के जज़्बात को शायर ने इन अज़कार में पिरोया है,
”ऐ ईद के चाँद! क्यों तू हमें रुलाता है,
बिछड़े हुए अपनों की हमें याद दिलाता है।
यूँ तो हर तरफ है रौनक और खुशियों का समां,
मगर खाली घर हमें अपनी तन्हाई सुनाता है।”
और इस बदलते हुए मंज़र और यादों के तसल्सुल पर एक और लाजवाब शेर है,
”सब गले मिल के मुबारकबाद देते रहे,
पर मुझे गुज़रा हुआ एक दौर याद आया है।
अब के भी ईद गई यूँ ही दबे पाँव मेरे,
दिल में जो दर्द था वो आँखों में उतर आया है।”
यह मुकम्मल मंज़रकशी हमें याद दिलाती है कि ज़िंदगी खुशियों और ग़मों का एक हसीन इंतज़ाम है, जहाँ हर ईद एक नया तज़ुर्बा और एक नई सीख लेकर आती है।



