
सूर्य-तेज़ की तपन है,
हवा भी तो गरम है,
उड़ते-उड़ते ढूंँढ़ती है।
पानी का सकोरा देखते ही,
पंख पसारे धरती पर आई,
चोंच में जल भरकर गौरैया,
तृप्त आत्मा से देती दुआएं,
मुंँह खोले ढूंँढ़ती है चहुँओर,
दिखती नहीं कहीं घनी छाया।।
जो मानवता जीवित है तो,
वृक्षारोपण कर पालो-पोसो,
जीवों के संग खुद का भला करो,
कुछ तो लाज धरो वसुधा का,
जो हम सबको धारण करती है,
हर गर्मी संदेशा दे जाती है,
प्यारी-प्यारी सी नन्हीं गौरैया।।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यः निःसृत,©®, रूद्रपुर, उत्तराखंड।।


