साहित्य

ग़ज़ल ऐ ज़िन्दगी बता कहाँ कहाँ कमी कोई यहाँ निकली

डॉ. मुश्ताक अहमद शाह

मैं उससे प्यार करता था मगर वो बेवफ़ा निकली,
ऐ ज़िन्दगी बता कहाँ कहाँ कमी कोई यहाँ निकली।

न शिकवा था निगारों (सुंदर चेहरों) से, न गैरों से बुराई थी,
लिखी जो हाथ की लकीरों में, बस वो बद-गुमां (बुरी तकदीर) निकली।

सदाक़त (सच्चाई) की वकालत में, गवाही कौन देता अब,
अदालत वक्त की थी और मुंसिफ़ (जज) की ही खता निकली।

सँवारा था जिसे मैंने अपनी रातों को जला कर के,
वो क़िस्मत की लकीरें ही दुश्मने जां यहाँ निकलीं।

बहुत मसरूफ़ थे वो अपनी दुनिया को सजाने में,
हमारी बेबसी ही वक्त का बेसबहा तोहफ़ा निकली।

जिन्हें मल्लाह (नाविक) समझा था, वही लहरों के साथी थे,
किनारे पर पहुँचते ही जो कश्ती थी वो फना (नष्ट) निकली।

मुश्ताक! यूँ ही नहीं टूटा है शीशा मेरी चाहत का,
मेरे हक़ में मुक़द्दर की बड़ी गहरी सज़ा निकली।

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