साहित्य

ग़ज़ल – तेरह बरस की खामोशी

दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

तेरह बरस से कोमा में सोया हुआ रहा है,
माँ-बाप का हर सपना भी रोता रहा है।

आँखों में दुआओं का उजाला लिए खड़े थे,
किस्मत का मगर द्वार न खुलता रहा है।

हर रोज़ मशीनों की ही साँसों पे टिका वो,
जीवन का दिया जैसे ही बुझता रहा है।

माँ ने तो दुआओं का सहारा नहीं छोड़ा,
पिता का भी कलेजा यही ढोता रहा है।

आँगन में जहाँ हँसी की गूँजें थीं कभी,
अब दर्द का सन्नाटा ही सोता रहा है।

तेरह बरस तक मौत से लड़ते रहे दोनों,
उम्मीद का दीपक भी थरथर जला है।

पत्थर भी पिघल जाए ये मंज़र जो कोई देखे,
माँ-बाप का सीना ही मगर पत्थर रहा है।

जब मुक्त किया पीड़ा से अपने ही लाल को,
ममता का समंदर भी वहीं रोता रहा है।

मौन पड़ी देह ने जब दान किए अपने अंग,
मानवता का दीपक भी तब जगमग रहा है।

इतना बड़ा साहस भी कहाँ मिलता है जग में,
इतिहास भी इस त्याग से दंग-सा रहा है।

‘दिव्य’, तेरह साल की पीड़ा का जो अंत हुआ,
माँ की आँखों से भी आशीष ही बहता रहा है।

कैसे आए शांति

आज जब दुनिया के कई कोनों में बारूद की गंध फैली है,
जब मिसाइलों की गर्जना मानवता की करुण पुकार को दबा रही है,
जब स्वार्थ और शक्ति प्रदर्शन के कारण धरती का आकाश धधक रहा है—
तब एक प्रश्न हर संवेदनशील मन में उठता है…
क्या युद्ध ही समाधान है?
क्या नफरत ही भविष्य है?
भारत की संस्कृति सदियों से यही कहती आई है—
“वसुधैव कुटुम्बकम्”- पूरी धरती एक परिवार है।
इसी भाव को लेकर कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं—

जलती दुनिया पूछ रही है मानव से यही आज,
कब तक नफरत बोएगा तू, कब आएगा समाज?

भारत ने हर युग में जग को प्रेम-पथ दिखलाया है,
नफरत की इस रात में फिर शांति का सूरज लाया है।

जब-जब दुनिया युद्ध की ज्वाला में जल जाती है,
मानवता की करुण पुकार गगन तक चल जाती है।

तब भारत का स्वर उठता है धैर्य और विश्वास से,
प्रेम जले हर दिल में जग में, शांति आए प्रकाश से।

मिसाइलों की गर्जन से जब कांप उठे आकाश यहाँ,
बारूदों की आँधी में जब बुझ जाए विश्वास यहाँ।

तब भी भारत सत्य-अहिंसा का दीप जलाता है,
घायल इस संसार को फिर जीना सिखलाता है।

लालच के बाज़ारों में जब रिश्ते भी बिक जाते हैं,
तेल-गैस की खातिर कितने घर-आँगन जल जाते हैं।

भारत फिर मानवता का पावन मंत्र सुनाता है –
“वसुधैव कुटुम्बकम्” का दीप जगत में जलाता है।

शक्ति हमारी शांति बने, यह संकल्प हमारा है,
युद्ध नहीं समाधान जगत का, प्रेम ही किनारा है।

सत्य, करुणा, धैर्य, क्षमा का पथ जब जग अपनाए,
तभी धरा के कोने-कोने में सच्ची शांति आए।

युद्धों की ज्वाला से आखिर किसका भला हुआ है,
हर बार मानवता का ही आँचल जला हुआ है।

आओ मिलकर प्रेम का फिर दीप जलाएँ हम,
नफरत की इस रात को मिलकर मिटाएँ हम।

भारत की यही पुकार सदा संसार तक जाए –
जब मानव, मानव बन जाएगा, तभी धरा पर शांति आए।

संघ ज्योति गीत

हम संघ पथिक निराले,
भारत गौरव गाएंगे।
त्याग, तपस्या की ज्योति
जन-जन में फैलाएंगे।

जय संघ! जय संघ!
जय संघ!जय संघ!

ध्वजा के पावन छाँव में
संकल्प हम निभाएंगे।
सत्य, साहस और अनुशासन
सदैव साथ लाएंगे।

जय संघ! जय संघ!
जय संघ!जय संघ!

केसरिया ध्वज के नीचे हम
सदैव प्रण निभाएँगे।
अंधकार जब छाए जग में
दीपक हम जलाएँगे।

जय संघ! जय संघ!
जय संघ!जय संघ!

संघ सूत्र में बंधकर हम
विश्व को राह दिखाएँगे।
जब-जब मातृभूमि पुकारे
हँसकर शीश चढ़ाएँगे।

जय संघ! जय संघ!
जय संघ!जय संघ!

राष्ट्र की महिमा बढ़ाने को
अपना तन-मन लगाएंगे।
संघ की सेवा से सदा
मन में प्रेरणा पाएंगे।

जय संघ! जय संघ!
जय संघ!जय संघ!

दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश
सम्पर्क सूत्र 8279709465

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