साहित्य

कैसे भूल गए

शेख रहमत अली "बस्तवी"

मां-बाप को छोड़ा व्रद्धाश्रम
जीवन से उनके दूर हुए,
अधिकार को अपने न भूले
कर्तव्य को कैसे भूल गए।

जिस पिता का बाज़ु बनना था
उस पिता से तुम क़तराते हो,
बीवी-बच्चों के शौक में डूबे
बाप को आँख दिखाते हो।
बूढ़ी हड्डी में जान कहाँ
रिश्तों से अपने झूल गए,
अधिकार को अपने न भूले
कर्तव्य को कैसे भूल गए…………..

जिस मां का तुमने दूध पिया
उस मां का कर्ज़ अदा कर दी,
देकर दुख उन्हें बुढ़ापे में
उनके सपनों में विष भर दी।
जिस मां के राज़दूलारे थे
उनकी अँखियों के शूल हुए,
अधिकार को अपने न भूले
कर्तव्य को कैसे भूल गए…………..

भाई का कैसा नाता है
ये कोई समझ न पाता है,
बहुओं के आने से घर में
हर इंच-इंच बंट जाता है।
बचपन में दोनों भाई थे
अब इक दूजे से क्रूर हुए!
अधिकार को अपने न भूले
कर्तव्य को कैसे भूल गए…………..

बहनों ने हमको प्यार दिये
मां बनकर हमें दुलार दिये
अपने हिंस्से का धन-दौलत
जाने क्यों हम पर वार दिये।
तकरार भुलाकर न भूले
पर प्यार को कैसे भूल गए,
अधिकार को अपने न भूले
कर्तव्य को कैसे भूल गए…………..

शेख रहमत अली “बस्तवी”
बस्ती (उ.प्र.)
7317035246

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