साहित्य

खुजली से आनन्द रस मिलता है (हास्य-व्यंग्य)

जयचन्द प्रजापति 'जय'

खुजली एक आनन्दमय त्वचा रोग है। जिस व्यक्ति को खुजली रहती है। उसे अच्छा लगता है, जब वह उसे खुजलाता है। भावविभोर हो जाता है जैसे दुनिया की न प्राप्त होने वाली चीज है और उस चीज को वह प्राप्त कर लिया हो।

खुजली ब्रह्म का दिया हुआ एक अमृत रस का पान होता है। सबको नहीं मिलता है जिसको मिलता है वह एक सच्चा भक्त होता है। समाज में व्याप्त अंधविश्वास, ईर्ष्या, गुस्सा, नफरत की आग, बेईमानी, लूटपाट, मारपीट, दंगा-फसाद, युध्द आदि खुजली की तरह होता है।

इसे लोग समाज से खत्म नही करना चाहते हैं। यह किसी खुजली से कम नहीं होता है। इस तरह की खुजली सामाजिक आनन्द देती है। मनोहारी होता है। खसर-खसर खुजलाने का एक अलग ही आनन्द मिलता है। ऐसा लगता है जैसे ईश्वरत्व की प्राप्ति हो गयी हो।

इस प्रकार की सामाजिक खुजली को खुजलाने में बड़ी-बड़ी हस्तियां लगी है। वे चाहें तो इस प्रकार की खुजली खत्म कर सकते हैं लेकिन खत्म करने में कोई दिलचस्पी नहीं लेगा। खुजली से आनन्द रस का मिलना बंद हो जायेगा।

देश के नेताओं को भी इस तरह की दुर्लभ खुजली का वरदान मिला होता है। देश के विकास के लिए रोड़े डालने की खुजली रहती है। समाज में अलगाववादी नीति को अपनाकर धार्मिक उन्माद फैलाने की खुजली रहती है।

तरह-तरह के युध्द की नीति अपनाकर देश-विदेश के नेताओं को इस समय खुजली बहुत तेजी से काम कर रही है। भयंकर दाद-खाज, खुजली अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त कर लिया है। इस समय दिमागी खुजली बहुत तेजी से वायरल हो रही है।

अगर इस तरह की खुजली को कोई ठोस रणनीति बनाकर खत्म नही किया गया तो देश समाज की यह खुजली किसी कोढ से कम नहीं होगी। इससे उत्पन्न देश समाज के लिए गंभीर संकट बन जायेगा।
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जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

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