साहित्य
कठपुतलियां हैं हम

डोर हमारी संचालित है,
किसी और हाथों में।
क्रूर नियति के उपादान भी,
हर पल जीवन बाधित करते,
राह सामने पर जाने क्यों,
पग अपने.ही पीछे हटते।
हम परवश हैं.
सुख दुख सारे जीवन के,मन के आंसू.
सब पर हम अधिकार हीन.
हमें नचाती नियति नटी सी ,
लहरों से.हम उठते गिरते।
प्राणहीन प्रतिमा जिसकी ,
पहचान नहीं अपनी कोई।
है डोर संभाले जगत नियंता,
सारी दुनिया जिसमें खोई।
हम नाच रहे हैं,
हर भूमिका .संवादी पात्रों में,
जीते मरते,क्योंकि , कठपुतलियां हैं हम,
डोर हमारी संचालित है,किसी और हाथों में।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर




