साहित्य

माँ का रूप

पूर्णिमा सुमन

लाल चुनरी सितारों जड़ी, अंग मैया के सोहे।
रूप पावन माँ का ऐसा, देव-मुनि मन को मोहे।
भाल पर सिंदूर सोहे, चंद्र सा मुखड़ा खिला।
भक्त को माँ की शरण में, स्वर्ग सा सुख है मिला।

पायलें झनकार करतीं, गूँजता है आँगन सारा।
बहन रही है ममता की, पावन और अविरल धारा।
सिंह पर होकर सवार, माँ जगन्माता है आई।
हर हृदय में आज मैया, प्रेम की ज्योति जगाई।

हाथ में खप्पर विराजे, दुष्ट दल थर-थर डरे।
जो शरण में आए माँ की, कष्ट उसके सब हरे।
दीप की लौ जगमगाती, महकती चंदन की गंध।
भक्ति रस में डूबे भक्त, तोड़कर सारे ही बंध।

नौ दिनों का पर्व पावन, शक्ति की यह साधना।
कर रहे माँ भारती की, हम सभी आराधना।
आदि शक्ति, जगदंबा, तेरी महिमा है निराली।
भर दे माँ सबकी झोली, कोई जाए न खाली।

पूर्णिमा सुमन
झारखंड धनबाद

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