
आज तक दुनिया में जनमानस को एकत्व के सूत्र में बांधने के अनेक ढंग आजमाये जा चुके हैं। लेकिन अधिकांशतः ये ढंग शैतान प्रवृत्ति के लोगों के हाथों में पड़कर जनमानस के शोषण और उसकी गुलामी का कारण अधिक बनते आये हैं। जनमानस का कोई विशेष हित इनसे आज तक हुआ नहीं है।हां, जनमानस को अंधेरे में रखकर प्रचारित यही किया जाता है कि जनमानस का एकता के सूत्र में बंधकर रहना खुद उसकी सुविधा, खुशी, सहुलियत और विकास के लिये है।
पहले तो यही बात ग़लत है कि कभी ‘अनेकता में एकता’ संभव हो सकती है।जब एक बार किसी ने यह स्वीकार कर लिया कि हर स्तर पर अनेकता मौजूद हैं तो फिर कोई कितना ही प्रयास करे,एकता संभव नहीं हो सकती है। हां,एकता का दिखावा किया जा सकता है। लेकिन यह दिखावा जल्दी टूट जाता है।इसकी आयु बहुत अल्प होती है।जब मूल में ही एकता मौजूद नहीं है,तो फिर ऊपर से थोपी गई एकता कब तक कायम रह पायेगी? थोड़ा सा स्वार्थ दिखा और एकता भंग। थोड़ी सी वासना जगी और एकता छूमंतर।जो जिसका स्वभाव नहीं है,वह अधिक समय तक अपने से कुछ अन्य होने का दिखावा अधिक समय तक नहीं कर सकता है।या तो आप सनातन आर्य वैदिक धर्म और संस्कृति के इस उपदेश को स्वीकार करो कि ‘एकता में अनेकता’ न कि ‘अनेकता में एकता’। यानी एकता अस्तित्व का मूल स्वभाव होने से वह स्वभाव मनुष्यों में भी अंतर्निहित है।बस ,उसे अभिव्यक्त करने की आवश्यकता है। केवल तभी कोई वेदवाणी की ऋचा में यह कहने का अधिकारी बनता है –
सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं तथा पूर्वे संजानाना उपासते।।
समानो मंत्र: समिति: समानि समानं मन: सह चित्तमेषाम्।समानं मंत्रभि मंत्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि।।
समानि च आकूति: समाना हृदयानि व:।
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति।।( ऋग्वेद 10,191)
ऋग्वेद की उपरोक्त ऋचाओं में एकता और समभाव की प्रेरणा देते हुये सबकी गति, विचारधारा,मन और बुद्धि में सामंजस्य की प्रेरणा प्रदान की गई है। सभी एक होकर रहो।सभी प्रेमपूर्ण संवाद करो।विरोध त्यागकर समान मन बनो। हमारी प्रार्थना एक समान हो।सबके संकल्प समान हों। हृदय एक समान हों।मन एक समान हों। सभी के सभी कार्य पूर्ण रूप से संगठित हों।
बेशक मजहबी पुस्तकों से प्रेरित करोड़ों मतांध लोगों ने हम की भावना का दुरुपयोग किया हो लेकिन
वेद ने तो सबके लिये समान रूप से अवसर प्रदान करते हुये आनंद,खुशहाली, प्रसन्नता, समृद्धि,समस्वरता,सौहार्द आदि के लिये एकता की बात की है। लेकिन विडंबना यह है कि शैतानी, अब्राहमिक शक्तियों ने प्रबल होकर इस एकता को अपने विध्वंसक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये प्रयोग किया है।इस शैतानी शक्ति को अब्राहमिक मजहबों में इब्लिश,,,,,,
आदि नामों से संबोधित किया है। अब्राहमिक मजहबों में यही नकारात्मक शक्ति लगातार काम कर रही है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एकतरफा विकास इसी शैतानी शक्ति की प्रेरणा पर हुआ है। सात्विक शक्तियों करुणा, सहयोग, संवेदनशीलता, सौहार्द,प्रेम आदि का इनके लिये कोई महत्व नहीं है। बिना स्वार्थ के ये कोई काम नहीं करते हैं। यदि स्वार्थ पूरा नहीं होगा तो ये अपने किसी भी सहयोगी को मरने के लिये छोड़ देंगे।जब किसी से स्वार्थ पूरा हो चुका होगा,तो भी ये उसको छोड़ देंगे। किसी प्रकार के सृजनात्मक जीवन-मूल्यों और नैतिकता का इनके लिये कोई मूल्य नहीं है।भूख लगने पर ये अपने निकट संबंधियों को भी मारकर खा सकते हैं।प्यास लगने पर ये अपने परिवारजन का भी रक्तपान कर सकते हैं। सनातन धर्म और संस्कृति के नैतिक – मूल्यों के पालन की बात तो इनके लिये कमजोरी का प्रतीक है।फ्रैड्रिक नीत्शे को बेशक ईसाईयत का विरोधी प्रचारित किया जाये, लेकिन यह बिल्कुल ग़लत है। वास्तव में वह कट्टर ईसाई था। उसने कहा था कि नैतिकता कमजोर व्यक्तियों द्वारा शक्तिशालियों को झुकाने की साज़िश मात्र है।शक्ति ही सब कुछ है। शक्ति के द्वारा सुपरमैन बनना ही सच्चा विकास है। हिटलर जैसे तानाशाहों के पैदा होने में नीत्शे जैसे सनकी लोगों का हाथ रहा है। हिटलर ने युरोप में कितने कत्लेआम किये थे, सबको मालूम है। लेकिन अंत में परिणाम यह हुआ कि उनको खुद भी आत्महत्या करनी पड़ी और जर्मनी को भी बर्बाद कर दिया।जिन लाखों यहुदियों का नरसंहार किया था आज वही मुट्ठी भर यहुदी पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचा रहे हैं। चाहे चमत्कारी वैज्ञानिक तरक्की हो या दुनिया के प्रसिद्ध लोगों को फंसाने के लिये एपस्टीन फाईल हो- यहुदी देश इजरायल का किसी से कोई मुकाबला नहीं है।कयी सदियों पहले रोमन लोगों ने यहुदियों के धर्मस्थलों को नष्ट कर दिया और यहुदी पूरी दुनिया में बिखर गये।बाद में यही मारकाट , नरसंहार और मतांतरण का कार्य इस्लाम ने किया।1700 वर्षों पश्चात् यहुदी फिर से इकट्ठे हुये और एक अंतहीन मारकाट की फिर से शुरुआत हो गई। पिछले अस्सी वर्षों से जेरुसलम और इसके चारों तरफ बसे हुये मुस्लिम देश का युद्धों का सिलसिला चल रहा है। अमरीका और रूस अपने हथियार बेचकर मालामाल हो रहे हैं। चीन भी बीच में कूदा हुआ है। जापान ने सन् 1945 के पश्चात् युद्धों से दूर रहकर अपने विकास पर ध्यान दिया है। चाहे यहुदी हों,चाहे युनानी हों,चाहे रोमन हों,चाहे इस्लामी हमलावर हों ,चाहे हिटलर, मुसोलिनी, स्टालिन, माओ जैसे तानाशाह हों या फिर आज के अमरीका,रुस,चीन आदि हों -सभी ने हम की भावना की आड़ लेकर दुनिया में मारकाट, नरसंहार और मतांतरण को बढ़ावा दिया है।इस हम की भावना का सात्विक, सृजनात्मक और सौहार्दपूर्ण सदुपयोग भी किया जा सकता था, लेकिन शैतानी शक्तियों की प्रबलता के कारण ऐसा नहीं हो पाया है।
राजनीतिक सिस्टम की कमजोरी के कारण भारत पिछले पिचहतर वर्षों में कोई खास तरक्की नहीं कर पाया है।इसीलिये अमरीका,रुस, चीन, इजरायल आदि के सामने आज भारत की हैसियत एक गुलाम और गरीब देश की बन चुकी है।हालत ऐसी हो चुकी है कि अमरीका और युरोप आदि भारत पर जोर डालकर कुछ भी करने के लिये विवश कर सकते हैं और विवश कर भी रहे हैं।इस सारे अंतरराष्ट्रीय खेल में शैतानी शक्तियां खुला तांडव कर रही हैं जबकि सात्विक और दैवीय शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाला भारत असहाय होकर मुकदर्शक बना बैठा है। विकास और समृद्धि की सारी संभावनाओं के मौजूद होते हुये भी भारत कुछ भी नहीं कर पा रहा है। राजनीति संकल्प शक्ति शून्य है जबकि धार्मिक क्षेत्र में पाखंड, ढोंग, शोषण आदि व्याप्त हैं। वर्तमान भारतीय राजनयिक, धार्मिक और सुधार सिस्टम ने हम की भावना के माध्यम से सत्ता तो हथिया ली है लेकिन उस सत्ता का विध्वंशक दुरुपयोग किया जा रहा है।भाई को भाई से,जाति को दूसरी जाति से, एक मजहब को दूसरे मजहब से, एक राजनीतिक दल को दूसरे राजनीतिक दल से तथा विभिन्न धार्मिक संप्रदायों को दूसरे संप्रदायों से लड़ा- भिड़ाकर अव्यवस्था फैलाने का कुकृत्य किया जा रहा है। राष्ट्र विकास बिल्कुल उपेक्षित छोड़ दिया गया है। हजारों वर्षों से जिस भारतवर्ष ने दुनिया को सही राह दिखाने का काम किया था,आज वही भारतवर्ष हर क्षेत्र में पिछड़ेपन का शिकार है।
जिसको भी आपको गुलाम बनाकर शोषण करने की इच्छा होगी,वह सर्वप्रथम आपमें हम की भावना को पैदा करेगा।हम भारतीय,हम पाकिस्तानी,हम युनानी,हम ब्रिटानी,हम सनातनी,हम यहुदी,हम बौद्ध,हम क्रिश्चियन,हम मुसलमान,हम कांग्रेसी,हम भाजपाई, हम मार्क्सवादी,हम संघी,हम तमिलभाषी,हम पंजाबी भाषी,हम अंग्रेजी भाषी,हम हिब्रूभाषी,हम ऐकेश्वरवादी,हम द्वैतवादी,हम भौतिकवादी,हम साम्यवादी,हम नारीवादी,हम यूरोपीयन,हम एशियन,हम बालाजी भक्त,हम राधास्वामी,हम धीरेंद्र भक्त,हम आर्यसमाजी,हम ब्राह्मण,हम जाट,हम रोड,हम दलित,हम पिछड़े,हम दक्षिण भारतीय,हम उत्तर भारतीय आदि आदि संबोधन से एकता की स्थापना करके सृजनात्मक या विकासपरक काम बहुत कम लेकिन वैमनस्य, द्वेष, लड़ाई -झगडे,मारपीट, हिंसा और शोषण के काम बहुतायत से किये जाते हैं।एक झंडे,एक निशान,एक प्रतीक,एक नारे,एक पोशाक, एक पुस्तक,एक पूजा पद्धति, एक महापुरुष,एक भाषा,एक राष्ट्र,एक निवास स्थान,एक गुरु आदि को केंद्र में रखकर स्थापित की गई एकता की भावना के माध्यम से पिछले 5000 वर्षों के दौरान कितने सृजनात्मक और विकास के काम हुये हैं तथा कितने युद्ध, हिंसा,मारकाट, आगजनी और गुलाम बनाने के कार्य हुये हैं – इसको निष्पक्षता से देखो। आपको बर्बादी और विनाश अधिक मिलेगा तथा विकास और समृद्धि नगण्य मिलेंगे।
नेताओं को अपनी राजनीति चमकानी हो, गुरुओं को अपना गुरुडम चलाना हो,किसी योगाचार्य को अपना योगाश्रम चलाना हो ,किसी को अपनी जाति का अगुवा बनना हो- वह सर्वप्रथम ‘मैं’ की जगह पर ‘हम’ की भावना पैदा करेगा।उस ‘हम’ की भावना को पैदा करके फिर वह दूसरों से होने वाले काल्पनिक खतरों की भयावह तस्वीर आपमें खींचेगा। भयभीत होकर आप उसके झंडे, उसके संगठन, उसके भडकाऊ नारे के नीचे आकर भीड़ का हिस्सा बन जायेंगे।जब -जब आप अपने गुरु, नेता, जातिवादी उद्धारक या मार्गदर्शक के समीप आओगे तो आपकी ‘मैं’ की भावना विलीन होकर ‘हम’ की भावना प्रबल हो जायेगी।बात यहीं पर आकर रुक जाती तो कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन शोषक लोगों द्वारा अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये बात बहुत आगे तक बढ़ाई जाती है ताकि वो जमकर आपका शोषण कर सकें। सांसारिक रुप से इस हम की भावना के माध्यम से विकास, समृद्धि और खुशहाली के काम करवाये जा सकते हैं। लेकिन जो धूर्त, स्वार्थी और शोषक होते हैं,उनको केवल अपने विकास और समृद्धि से मतलब होता है। धरती पर बहुमत उन लोगों का है जो जाति ,मजहब, भाषा, क्षेत्र, पूजा-पाठ आदि के माध्यम से जनता में हम की भावना पैदा करके उनको दूसरे नागरिकों के प्रति भडकाते हैं। परस्पर दुश्मनी पैदा करते हैं। इससे उनका उद्देश्य तो पूरा हो जाता है लेकिन जनता जनार्दन प्रतिदिन बदहाल होती जाती है।
भारत में शोषक प्रवृत्ति के महत्वाकांक्षी लोगों ने अपने सत्ता प्राप्ति के राजनीतिक उद्देश्य को पूरा करने के लिये गरीबी हटाओ ,सेक्यूलरिज्म, राष्ट्रवाद , स्वदेशी ,भारतमाता की जय,गर्व से कहो हम हिन्दू हैं,हिंदुत्व, हिंदी भाषा,गाय, गंगा, गीता, राममंदिर , कृष्ण जन्मभूमि आदि आदि के नारों के माध्यम से जनता -जनार्दन में हम की भावना पैदा करके उसका जमकर शोषण किया है। जनता जनार्दन को इन लोकलुभावन नारों के बदले में सिर्फ गरीबी,शोषण, बदहाली, सांप्रदायिक और जातिवादी वैर भाव, हिंसा, भेदभाव और पिछड़ापन ही मिले हैं। लोकलुभावन और उत्तेजक नारे अधिकांशतः शोषण करने के लिये ही प्रयोग में लाये जाते रहे हैं।
दुनिया के नेता, धर्माचार्य, योगाचार्य,जातीय और सांप्रदायिक सुधारक कब ‘हम’ की भावना का सृजनात्मक उपयोग करना शुरू करेंगे? कुछ ऐसे अवश्य हैं जो यह कार्य कर रहे हैं लेकिन बहुमत विध्वंस करने करने वालों का है।’हम’ की भावना का दुरुपयोग जनमानस के ऊपरी मन के तार्किक हिस्से को गहरी बेहोशी में सुलाकर मन के गहरे आस्थावान हिस्से को अपने नियंत्रण में करके कोई भी हिंसक, अमानवीय, अलोकतांत्रिक और युद्धक कार्य करवाया जा सकता है। और इसे वैश्विक स्तर पर करवाया भी जा रहा है। भारतीय पुरातन योग विद्या का अभ्यास जहां पर मन के चेतन, अवचेतन और अचेतन हिस्सों को अखंड करके व्यक्ति में होश, जागरुकता और सजगता को उजागर करके खुशहाली,प्रेम, करुणा और सौहार्द को जन्म देती है, वहीं पर अब्राहमिक विचारधारा के विभिन्न देश व्यक्ति को हिंसक, स्वार्थी,क्रूर, बदले की भावना से ग्रस्त और युद्ध प्रिय रक्तपिपासू बनाने पर अपनी पूरी ऊर्जा को खर्च करते आ रहे हैं।वह रामराज्य कब आयेगा जब इस कुकृत्य पर प्रतिबंध लगेगा? तभी हम वेद की वाणी में कह सकेंगे – ‘वसुधैव कुटुंबकम्, कृण्वंतो विश्वमार्यम्,यतेमहि स्वराज्ये,सर्वे भवन्तु सुखिन:, मनुर्भव।
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डॉ.शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र -विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र-136119



