
चौपई/जयकरी छंद
कर लो तुम कितना भी प्यार।
फिर भी कुछ खाते हैं खार ।।
आस्तीन के हैं वही सांँप ।
जिनको हम कब पाये भाँप ।।
हरदम ही रहते हैं साथ ।
अवसर पा सिलवट दें माथ ।।
सबसे अच्छी है यह बात ।
मित्र न देखे कोई जात ।।१।।
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तब तो दिखे न कभी दुराव ।
मन के पूरण हों जब भाव ।।
जब पा जाते ज्यादा अंक ।
तब मन में कब रखते शंक ।।
जब आता मित्रों के काम ।
तब ही जपते मेरा नाम ।।
हित-अनहित कब आते पास ।
मित्र बने हैं जो भी खास ।।२।।
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कृष्ण -सुदामा-सा कब मित्र ।
तरह-तरह के दिखें चरित्र ।।
बिन मित्रों के चले न काम ।
कुछ खट्टे-से मीठे आम ।।
वह देते हैं ऐसे ज्ञान ।
जिनसे होते हों अनजान ।।
इन बिन जीवन है बेकार ।
भेदभाव सब मटियामार ।।३।।
*_राम किशोर वर्मा*
जयपुर (राजस्थान)
दिनांक:- १२-०३-२०२६ गुरुवार




