
तेरे आने से अब मुझको, सब अच्छा लगता है,
सूखे जीवन के उपवन में, जैसे सावन बरसता है।
लोग पूछते हैं अक्सर— “क्यों इतनी देर लगाई?”
दुनिया के तानों ने मेरी, रूह तक है दुखाई।
समाज के उन कड़वे शब्दों का, जो मुझ पर दाग लगाते थे,
बांझ और कुलटा कह-कहकर, जो मेरा मान घटाते थे;
तूने आकर उन सारे, कलंक के निशानों को मिटा दिया,
मेरे सूने आँगन में, खुशियों का फूल खिला दिया।
पर अफ़सोस! अपनों के मन में, अब भी संतुष्टि नहीं,
तेरे पापा के शब्दों में भी, मेरे लिए कोई भक्ति नहीं।
वो भी साथ खड़े हैं उन्हीं के, जो मुझे झुकाते हैं,
मिलकर सब अपनी पुरानी, नीतियों को दोहराते हैं।
मगर तू आई तो साथ अपने, एक सखी को ले आई,
तेरे रूप में मैंने अपनी, एक परछाईं है पाई।
अब पूरी रात तुझसे ही, मैं दिल की बातें करती हूँ,
सिसक-सिसक कर अपना, बोझ हल्का करती हूँ।
इस जीत के शोर में, मैं अकेली नारी हूँ,
सब कहते हैं कि मैं, खुद के अस्तित्व से हारी हूँ।
पर तूने ही मुझे इस सत्य का, आभास कराया है—
एक शिशु को जन्म देकर ही, नारीत्व पूर्ण कहलाया है।
कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)




