
दो वक्त की रोटी को कमाने की खातिर,
अपने घर से आ गया बहुत दूर हूं मैं।
रोटी का एक निवाला चैन से नसीब नहीं होता,
वो अभागा गरीब मजदूर हूं मैं।
तेज तपती गर्मी में भी ईमानदारी से अपना काम करता हूं,
इंसान हूं पर जानवरों से बदतर सलूक करते हैं लोग।
ऊंचे बंगलों में रहते हैं पर इतना मोलभाव करते हैं,
दिखावे की दुनिया है करते हैं सब यहां ढोंग।
अपनी मेहनत की कमाई खाता हूं फिर भी करते हैं तिरस्कार,
जरा सा कुछ क्या मांग लेता हूं किसी से,
ऐसे देखते हैं जैसे कर रहे हो कोई बड़ा उपकार।
हम मजदूर की भी अपनी दुनिया होती है,
हमको भी मिलने चाहिए हमारे अधिकार।
हम दिन-रात मेहनत करते हैं तभी आप सुख पाते हैं,
फिर बेज्जती कर क्यों करते हो हमारे आत्मसम्मान पर प्रहार।
सौ, भावना मोहन विधानी
अमरावती महाराष्ट्र।



