
दशकों तक जो दफ़न रही, वो पीड़ा आज बाहर आई है,
कलम की सूखी स्याही ने, फिर से ली अंगड़ाई है।
वो मंजर याद आता है, जब पैरों तले ज़मीन न थी,
सिर्फ एक डायरी ही तो थी, जिसमें कोई कमी न थी।
पर हाथ लगी जब अपनों के, वो राज़ नुमाइश बन बैठे,
जो मरहम थे मेरे ज़ख्मों के, वही अब ख़लिश बन बैठे।
मैंने कोसा उस कागज़ को, मैंने तोड़ी अपनी कलम को,
कि क्यों न सहेज सकी वो मेरे, मन के भारी बोझ को।
पर आज खामोशी टूटी है, फिर वही साथी लौट आया है,
शायद मेरे भीतर के कवि ने, अपना हक़ आज जताया है।
अब न कमरों की दीवारों में, मेरी सिसकियाँ सिमटेंगी,
अब ये आज़ाद लहरें हैं, जो सागर बनकर उमड़ेंगी।
तुम बेवफ़ा नहीं थी डायरी, तुम तो बस एक दर्पण थी,
मेरी खामोश चीखों का, तुम ही इकलौता अर्पण थी।
चलो फिर से शुरू करते हैं, वही अधूरा सिलसिला,
कि कलम ही है वो ज़रिया, जिससे मेरा अस्तित्व मिला।
कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)




