
गमों के ढ़ेर पर भी मुस्कान की चिंगारी जलती रहे,
कैसे भी बादल छाएँ, मुस्कुराहट बरसती रहे।
ज़िन्दगी जीने को मुस्कुराना सीखना है,
मुस्कुराने की आदत से जहाँ को खिलखिलाना है।
अधरों के प्रस्फुटन से, हसीन फूल खिलते हैं,
रंजोगम के बीच भी दोस्ती मुस्कुराती है।
ऐ मुस्कान! तेरी अदा से बुझे दिल में भी चिराग़ जलते हैं,
दुनिया में जीने और जिलाने का मक़सद ढूँढ लेते हैं।
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, सद्यःनिःसृत,©®, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।



