
नारी का हर रूप अनूप है ,
नारी स्वयं छाया व धूप है ,
नारी शारदा लक्ष्मी व दुर्गा ,
नारी ये काली रूपी कूप है ।
नारी यह नर से सम्मानित ,
नारी का न अपमान करो ,
नारी से ही नर सृष्ट हुआ है ,
नारी का तुम सम्मान करो ।
नारी से नर नर से नहीं नारी ,
नारी सदा देवों पे भी भारी ,
नारी ही संस्कार की जननी ,
नारी ही घर घर को सॅंवारी ।
नारी को कोटि कोटि नमन ,
नारी की नहीं कभी लाचारी ,
नारी होती वहीं पर लाचार ,
जब मिल जाते व्यभिचारी ।
तभी नारी है दुर्गा से काली ,
नारी रूप है भयंकर धारण ,
साफ करे पतितों का पत्ता ,
दुर्जन के व्यभिचार कारण ।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।




