साहित्य

नव संवत्सर

सुषमा श्रीवास्तव

आगत है नव संवत्सर की बेला,
लाएगी संग अनगिनत बहारें ।
माता का दरबार सजेगा
गुड़ी पड़वा का पर्व मनेगा।
आगत है नव संवत्सर की बेला।।
भक्ति रस की बौछार बरसाती,
सबके तन- मन भिगोती आए।
नर-नारी,आबाल-वृद्ध सरसाती,
नवोत्साह, नवल आशा संग लाए।
आगत है नव संवत्सर की बेला।।
भक्तिभाव का इक अद्भुत मेला,
भक्तों के मन- मस्तिष्क में ठेला,
प्रकृति अनूठे-सौंदर्य में झूमती
शस्य श्यामला धन-धान्य से पूरित
आगत है नव संवत्सर की बेला।।
झुण्ड के झुण्ड आते रहते हैं,
माँ के जयकारे लगते रहते हैं,
सबकी झोली भर दे माँ!
सबको दरश तू  दे दे माँ!
सब को गले लगा ले माँ!
रंग-बिरंगी वसुधा मुस्काई।
नव संवत्सर की बेला आई।।

रचयिता – सुषमा श्रीवास्तव
मौलिक कृति,सद्यः निःसृत,
©®,रुद्रपुर,, ऊधम सिंह नगर,उत्तराखंड।

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