
एक दिन मैं
एक युवती को
सौंदर्य से युक्त
तन-मन यौवन से भरी थी
गौर वर्ण था
अंधेरी रात मेंं
जाते देखा
सफेद वस्त्र मे
सौंदर्यपूर्ण मुखमंडल पर
कोई श्रृंगार नहीं था
निर्भीक होकर
चली जा रही थी
मैंने उसके चरित्र पर
संदेह जताया
पीछा किया।
वह युवती
एक शहीद स्थल पर
कुछ पुष्प अर्पित किया
हाथ जोड़कर प्रार्थना की
देश के लिये
उसका पति
बलिदान हो गया था
जितनी श्रध्दा
उसके पति को देश से था
उससे अधिक श्रध्दा पति से
मैंने उस युवती में देखा
……….
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज



