
ओस की बूंद सा है,
ज़िन्दगी का सफ़र।
कभी फूल में तो,
कभी धूल में।
टपक कर कण कण पर,
मोतियों सी ढ़ल गई।
एक नमी सी रही हर वक़्त,
बूंद जब घास पर गिर गई।
बूंद छोटी सी थी ओस की,
ना समेट पाई थी मैं।
वो तो क्षणिक थी क्षण में,
हृदय को पीड़ित कर गई।
विदा हो गई उसी क्षण,
तेज किरण आई जो भू पर।
भाप बन उड़ पड़ी उसी पल,
जीवन का सार सीखा गई पर । ।
यह जीवन की धारा है
मिलता नहीं सहारा है।।
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ममता झा मेधा
डालटेनगंज




