
तुम्हारी पुण्य तिथि
याने एक दिन
जब तुम
अपने दोनों बेटे
और मेरे सामने
अस्पताल का पलँग कर
राम,राम, राम
बोलते हुए
24 धंटे बीच बिक में
अपने बच्चों से
बात करती जा रही थी
तुमने एक प्ले भी
24 धंटे में मेरी तरफ नही
देखा, जानता था
तुल मुझे देखे
इस वक्त,कमजोर
नही बनाना चहती थी
चाहती थी
जो भर जाना से
पहली बच्चो में
बात कर लो
मैने भी सहज स्वीकार किया
आखिर रात के सन्नाटे में
तुम अनायास चली गई
राम राम बोलते
एक सुख सुकून की
नींद सदा की लिए
वो पल
कैसे भूल सकता हूं
तुम्हारे पुरे अंग समय तक
तुम्हारे बच्चे और मैं
साथ था
यहां तक की
कितने दिनों से
किसी ने भी
घर आंगन में
दस्तक नही दी
जीना था
मुझे बच्चों के लिए
बिल्कुल नहीं रोया
पूरे माह
महीनों, एक अजीब
ताकत को समेटे था
नफरत हो गई
शहर से, अपनों से
सब से दूर हो गया
बस उसी दिन
सोच लिया था
जी कर दिखाएंगे
और कर जायेंगे
शहर नही
दुनिया देखे
तुम ने
तुम्हारी अद्भुत उपहार
रूह ने साथ दिया
और आज तुम्हारे
उसी रात में समेटे हुए
रह और तुम्हारी साथ को
सदा ही हर सांस में
महसूस करते
अच्छा जी गया
वो सब कर गुजरा जो
सोचा था
परम् शक्ति ईश्वर को
तुम्हें और तुम्हारी
अद्भुत शक्त उपहार
रूह के साथ स्नेह प्यार
ख्याल और आशीष को
सत् सत् प्रणाम करता हूं
बस स्व कुछ
तुम जानो
तुम्हारा राम जाने
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश




