साहित्य

प्यास का कल

जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी "जीत"

आज भी नल से गिरती हर बूँद
चुपचाप कुछ कह जाती है,
पर हम हैं कि उसकी आवाज़ को
अक्सर अनसुना कर जाते हैं।

वो नदियाँ, जो कभी गुनगुनाती थीं,
अब सूखे होंठ लिए बैठी हैं,
जिन किनारों पर जीवन हँसता था,
वहाँ खामोशी अब रहती है।

किसी गाँव की सूनी गलियों में
एक माँ आज भी टकटकी लगाए है,
घड़ा लिए खड़ा उसका बच्चा
बस पानी का नाम दोहराए है।

हमने ही छीना है उसका बचपन,
हमने ही प्यास को जन्म दिया,
अपनी सुविधाओं की चाहत में
प्रकृति से उसका हक छीन लिया।

जल सिर्फ जरूरत नहीं,
हर धड़कन की पहचान है,
ये बहे तो जीवन गाता है,
रुके तो सब सुनसान है।

आओ आज ये प्रण करें—
हर बूँद का मान रखेंगे हम,
धरती माँ की इस अमानत को
आने वाले कल तक बचाएंगे हम।

क्योंकि अगर आज भी न जागे हम…
तो कल हमारे बच्चों की आँखों में
सपने नहीं—सिर्फ प्यास बचेगी।

~ जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”
युवा लेखक, कवि एवं साहित्यकार
शक्ति,छत्तीसगढ़

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