
बनी सृष्टि की अनुपम रचना, रचती सकल विधान।
सबकी खुशियों की खातिर जो, हो जाती कुर्बान।
फिर भी मान नहीं वह पाती, जिसकी हैं हकदार,
जन्मदायिनी जो सबकी है, धरती की भगवान।।
बहन बेटियांँ न रहें संशंकित, ऊंँची भरें उड़ान।
पुरुष वर्ग संकल्पित होकर, रखें सदा यह ध्यान।
गलत दृष्टि जो इन पर डाले,उसका हो संघार,
अलग-अलग रूपों में इनका, करो सभी सम्मान।
नारी को नारायणि समझो,सफल करो अभियान।
सारे जग को रोशन करती, इनसे घर की शान।
बंँधी हुई रिश्तो के बंधन, चला रही संसार,
तन-मन को यह ऊर्जित करती,इनको दो पहचान।।
वीर प्रसूता भरत भूमि है, प्रकृति मिली वरदान।
अनुपम रचना प्रभुवर की है, नारी सृष्टि महान।
सारी बाधा जो हर लेती, ममता-समता साथ,
जीवन को सुखमय है करती,सबका रखती ध्यान।।
पूजन वंदन शिव का करती, दर्शन आठों याम।
मन मंदिर में सदा विराजें, सुखमय करते धाम,
करें कृपा भक्तों पर हरदम, महिमा बड़ी अपार, ,
इसीलिए हे जग वालों तुम,जपोसदा प्रभु नाम।।
डॉ गीता पांडेय “अपराजिता”
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश



