साहित्य

सूर्यास्त

पद्मा मिश्रा

हर सूर्यास्त अवसान नहीं होता
.न जीवन का.न मन का
.बस एक अंतराल है.समय का
.जैसे लहरों का उत्थान पतन.
जैसे दिन भर थककर सोया सूरज.।
मेरे.सामने खुला है नील गगन का विस्तार,
दिशाओं से छनकर आती ,,लालिमा प्रकाश की ।
धीरे धीरे उतर रही है.सांझ,
धरती के हरित आंचल पर ,
और अंधेरा छा रहा है दबे पांव कदम रखता।
अंधेरे को चीरकर पुन: जागता सूरज.
कल का आकाश जगमगायेगा फिर.
आशा की किरणें फिर मुसकरायेंगी।
सूर्यास्त प्रतीक है उम्मीदों का,
जैसे हर अंधेरा प्रकाश का वाहक है।
दोनो ही प्रकृति के सुंदर उपादान.
आदि और अंत.
. सूर्योदय और सूर्यास्त। ..*पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर*

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