साहित्य

तन मन को आंदोलित करता

डॉ जगदीश नारायण गुप्त "जगदीश"

मैं राम नाम को नित जपता। तन मन को आंदोलित करता।
प्रभु की महिमा होती न्यारी। जन- जन को लगती है प्यारी।।
नित राम जपो आठो यामी। सुख दे राम चरित जग स्वामी।
प्रभु भजन नित्य मन से गाओ। अपने जीवन में सुख पाओ।।

नित करूँ साधना प्रभु तेरी। हर इच्छा पूरी कर दो मेरी।
दुख भूल गए हम सब अपने। पूरे कर दो भगवन सपने।।
अब तो पार लगाओ नैया। दे दो मुझको सुख की छैया।
मैं हूँ तेरा ही अनुगामी। हे सुनो जगत के तुम स्वामी।।

हरपल देते कठिन परीक्षा। देना हे प्रभु मुझको भिक्षा।
नैना तरस रहे हैं मेरे। कब होंगे प्रभु दर्शन तेरे।।
अब तो दरश दिखा दो भगवन। अर्पण करता हूँ मैं तन-मन।
मन के मैल सदा मैं धोता। मन मेरा अब पुलकित होता।।

डॉ जगदीश नारायण गुप्त
“जगदीश”
बनारस✍️✍️

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