
बड़ी आसानी से टूटे हैं हमारे रिश्ते
मिट चुके हैं जहांँ जज़्बात
फिर कहांँ के रिश्ते!!
ज़ख़म देते हैं रोज़ हमारे अपने ही
कुछ हमारे तो कुछ तुम्हारे रिश्ते!!
तीसरे की कहांँ ज़रूरत है
अपना है पैर और कुल्हाड़ी से रिश्ते!!
रोज़ के ताने अब भी जारी है
क्यों बताएंँ अजनबी को हमारे रिश्ते!!
रात बेचैनी लेकर आती है
अब रज़ामंद नहीं है हमारे रिश्ते!!
उनको पैसों का गुरूर ज्यादा है
और मुफ़लिसी से है हमारे रिश्ते!!
अब ना मर जाए तो फिर क्या जी ले
ज़िन्दगी से बढ़कर है हमारे रिश्ते!!
सिर्फ़ एहसास की ज़रूरत है
यूँ पुराने से है हमारे रिश्ते!!
ज़रा सी ठेस लगते ही दिल टूट गया
अब मोहब्बत में नहीं है हमारे रिश्ते!!
बड़ी आसानी से टूटे हैं हमारे रिश्ते..!!
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान



