
जीवन मृत्यु और मोक्ष के बीच उलझे हुए मानव मन की व्यथा को व्यक्त करती हुई रचना
वह मानव ही था – जो
जीवन और मृत्यु के भंवर में
उलझा हुआ…..,
क्षितिज पर खड़ा था,
वह मानव ——– जो,
जीवन के बीते हुये पलों से
कुछ पल चुराता है और,
इस जीवन के…..,
माया जाल से मुक्त होकर,
मानव जन्म से उऋण
होने को आतुर,
वह मानव ——–,
. जो अपने..,
मोक्ष की कामना लिये हुये,
जीवन और मरण के बीच,
क्षितिज के उस पार -को
अग्रसर हो रहा है,
वह मानव — ही था,
जो उलझा हुआ -था
जीवन और मृत्यु के भंवर में |
शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली -पंजाब




