
जब मैं व्यंग्य लिखता हूँ। दो चार दुश्मन तैयार हो जाते हैं। दांव-पेंच लगाते रहते हैं कि इस व्यंग्यकार का गला दबा दो। न रहेगी बांस, न बजेगी बांसुरी। सबकी बुराई हंस कर देता है। व्यंग्य का तीर ऐसा छोड़ता है कि सीधे अंतड़ियों को फाड़कर रख देता है।
एक बार एक व्यंग्य लेख लिख दिया। क्षेत्र के कुछ साहित्यकारों को अच्छा नहीं लगा। घर तक पहुँच गये। हमारे घर शिकायत कर दिये। यह आवारा आदमी है। जो मन में आता है लिख देता है। हम लोग हीन भावना से ग्रस्त हो गये हैं। इसका इलाज कराओ, नहीं तो हम लोग खुद कर देंगे
व्यंग्यकारी करना कोई बायें हाथ का खेल नहीं होता है कि चुटकी बजाकर लिख दिया। इसके लिये ओखली में सिर देना पड़ता है। ईर्ष्या की आग में जलना पड़ता है। घाट-घाट का पानी पीना पड़ता है। मुंगेरीलाल के सपने की तरह शब्दों के सपने गढ़ना पड़ता है। तब कहीं एक विध्वंसक व्यंग्य लेख लिखा जाता है।
व्यंग्य का तीर जिसे चुभता है। उसकी बड़ी से बड़ी इमारतें खंडहर में तब्दील हो जाती है। सामाजिक नासूर को ठीक कर देता है। समाज सुधार की प्रक्रिया तेज हो जाती है। द्वंद्व की भावना तीव्रगति का रूप ले लेता है। ह्रदय की गहराइयों तक ठेस पहुंचा देता है।
व्यंग्य से मुर्दा व्यक्ति भी दौड़ने लगता है। दोस्ती में दाग लग जाती है। पत्नी मायके चल देती है। भावना में दुर्भावना आ जाती है। यहाँ तक व्यंग्य की क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि विकलांग मानसिकता का व्यक्ति ठीक हो जाता है। व्यंग्य एक त्वरित उपचार का टानिक की तरह होता है।
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जयचन्द प्रजापति जय’
प्रयागराज




