
धुआं उठा है द्वेष का, फैला चारों ओर।
बम गोला बारूद का, गूंँज रहा है शोर।
संकट में पर्यावरण, संकट में प्राण।
डोर प्रेम का जल रहा, नित्य रुलाए भोर।।
भय में बीते जिंदगी, घूँट रही है श्वास ।
छत पर बैठा काल है, दृग में जीवित आस ।
निगल रहा है युद्ध अब, खुशियों का संसार ,
हाथ लगे है कुछ नहीं अश्रु रहेगी पास।।




