
तस्वीर में एक सादगी है,
जैसे बीते समय की कोई धीमी-सी रागिनी हो।
हरे रंग की उस कमीज़ में
जैसे उम्मीदों का मौसम बसता हो।
वो हल्की-सी मुस्कान कहती है,
कुछ सपने आँखों में अभी ताज़ा हैं,
कुछ रास्ते तय करने बाकी हैं,
कुछ मंज़िलें अभी पुकारती हैं।
दरवाज़े के सामने खड़ा वो युवक,
सिर्फ एक तस्वीर नहीं—एक दौर है,
जहाँ जिम्मेदारियाँ धीरे-धीरे
कंधों पर आकार लेने लगी थीं।
वक़्त ने शायद बहुत कुछ बदला होगा,
पर उस पल की मासूमियत अब भी वही है,
जैसे 2016 का वो दिन
आज भी दिल के किसी कोने में ठहरा हुआ है।
तस्वीरें सिर्फ चेहरे नहीं दिखातीं,
ये सफ़र की शुरुआत बताती हैं,
और ये तस्वीर कहती है—
“मैं था, मैं हूँ, और मैं आगे भी बढ़ता रहूँगा।”
अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)
अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)




