
पुरुष बनना भी
आसान नहीं होता है
जीवन में
संघर्षो का दौर होता है
अडिग रहना
बीमार पत्नी के साथ
वक्त के हालातों में
खड़े रहना होगा उसके साथ
झेलती पत्नी को
जो कैंसर से ग्रसित है
दर्द के समय
तुम्हे ढाढस देना होगा
खुद की रोटियां बनाना होगा
बच्चों के लिये
टिफिन तैयार करना होगा
उन सब के लिये
काम पर भी जाना होगा
हंसने का समय नहीं होगा
एक मिनट भी समय नहीं होगा
किसी से मिल लूं
ये बाग
लहलहाती पत्तियां
लहराती गेहूं की बालियां
झूमती डालियां
पूर्णमासी की चांदनी रात
बहती पुरवाई
ये झरने, नदियां
अब कोई आकर्षित नहीं कर सकेगा
जब शुरू होगा
जीवन का झंझावट
बिना हारे
एक पुरुष बनने जा रहे हो
रात दिन तुमने
बीमार पत्नी को
अपनापन दिया है
इन मुसीबतों में
पत्नी के चेहरे पर
जब मुस्कान दौड़े
तब समझना
तुम उसके लिये
एक योग्य पुरुष हो
……..
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज




