साहित्य

तेरे जाने के बाद दीवारें भी कम बोलती हैं*

शशि कांत श्रीवास्तव* 

*तेरे जाने के बाद दीवारें भी कम बोलती हैं*

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तेरे जाने के बाद दीवारें भी कम बोलती हैं,

जो कोने तेरी हँसी से महकते थे कभी,

अब खामोशियाँ वहाँ पसरी हुई हैं,

वो खिड़की,

जहाँ बैठकर घंटों तेरा इंतज़ार किया करता था,

वो आज भी खुली रहती है पर,हवा धीरे-धीरे चलती है,

चाय के दो कप में से एक अब भी खाली रहता है,

तेरी यादों का मेहमान बनकर -सदा,

हर शाम मेरे संग बैठता है जो,

तेरी आवाज़ के बिना घर घर-सा नहीं लगता,

जैसे कोई गीत अधूरा सा हो,

कभी रात के सन्नाटे में तेरा नाम पुकार लेता हूँ,

फिर अपनी ही धड़कनों से तेरा उत्तर सुन लेता हूँ,

जीवन जीने का यही एक सहारा जो है,

क्योंकि मन तो वहीं ठहरा रहता है ना,

जहाँ आख़िरी बार तेरी आँखों ने मुझसे कुछ कहा था,

तेरे जाने के बाद सिर्फ़ लोग ही नहीं बदले,

सच कहूँ.. तुमसे,

एक वो आईना जो अब मुझसे कम ही बातें करता है,

और दूसरी वो दीवारें जो अब कम बोलती हैं,

क्योंकि घर की हर आवाज़ में बस तेरी ही कमी बोलती है ||

 

*शशि कांत श्रीवास्तव*

डेराबस्सी मोहाली, पंजाब

22-06-2026

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