साहित्य

ए वक्त जरा तू धीरे चल

डॉ ऋतु अग्रवाल

मेरे दिल में होती हलचल।
साँसें उठतीं- गिरतीं पल-पल।।
मैं तनिक हृदय को समझा लूँ।
ए वक्त जरा तू धीरे चल।।

अम्मा-बाबा आनंदित हैं।
घर के सब कोने पुलकित हैं।।
तोरण दरवाजे पर लटकीं।
कहतीं-हम भी तो हर्षित हैं।।

हल्दी-उबटन से तन चमका।
उनकी छवि से यह मन दमका।।
जब थाप लगी ढोलक पर तो।
सोहर से घर-आँगन गमका।।

शुभ घड़ी मिलन की आई है।
बजती मंगल शहनाई है।।
नित लजा-लजाकर देखा तो।
दर्पण में छवि सरसाई है।।

बारात खड़ी है द्वारे पर।
सब नाच रहे चौबारे पर।।
मैं साथ खड़ी होकर चल दी।
बस माँ के एक इशारे पर।

सहसा आँखें टकराई थीं
माँ धीरे से मुस्कुराई थीं।।
उनकी आँखों में पानी था।
यह घड़ियाँ तो दुखदाई थीं।।

मैं लिपट गई माँ के आँचल।
नैना बरसे जैसे बादल।।
ए वक्त जरा तू धीरे चल।
माँ-पापा साथ न होंगे कल।।

डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश

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