साहित्य

लोरी

शशि कांत श्रीवास्तव

धीरे से आ …जा ,
आ …जा …री निंदिया
आ …जा …,चुपके से
आ …जा …,
सो रही है मेरी राज दुलारी
आ …जा …,धीरे धीरे
धीरे से आ …जा ,
री निंदिया …,
सो रही है मेरी राज दुलारी
धीरे से आ …जा ,
बैठ के चंद्र किरणों के रथ पे
धीरे से आ …जा ,
री निंदिया …,
सो रही है मेरी राज दुलारी
आ जाना ,उसे ले के जाना
संग अपने ,
किरणों के रथ पर
चाँद तारों की सैर कराने
री निंदिया …,
धीरे से आ …जा ,
आ …जा …री निंदिया
आ …जा …., ||

शशि कांत श्रीवास्तव
डेराबस्सी मोहाली ,पंजाब

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