
लिखूँ जो खत तुझे,मैं तेरे नाम से।
जाएगा वो कहाँ? जो पता ही है नहीं।।
कहता हूँ मैं,मेरा दिल तेरे नाम से।
दुनिया में न कोई,जो हो तुमसा हंसी।।
ढूंढूं मैं तुझे,ये भला किस नाम से?
मुझको न मिली है,यार तुम तो कहीं।।
माना कि आती होगी,फेक नाम से।
फिरभी वो पैर होंगें,कहीं न तो कहीं।।
आया तो करो तुम,सपने में नाम से।
मिल जाएंगे हम तुम्हें,दुनिया में यहीं।।
प्यार की ऋतु ही,ऋतुराज नाम से।
आएगा मधुमास तो,न जाएगा कहीं।।
तू तो है मेरी,ये जीवन तेरे नाम से।
जन्नत की हूर का,शहजादा भी सही।।
बन जाएगी ये बात,हमारे नाम से।
प्रेयसी के दिल में,ये प्रियतम है कहीं।।
तेरे बिना जिऊं तो,मैं तेरे नाम से।
सुन रही हो ना,मैंने जो बात है कही।।
आखिरी सांस तक,मैं तेरे नाम से।
तुम आ जाओ यारा,आओ तो सही।।
ज्ञान विभूषण डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
(शिक्षक कवि लेखक साहित्यकार समीक्षक एवं समाजसेवी)




