साहित्य

खुशियों की पतंग और संस्कारों की डोर

ज्योती वर्णवाल

बाज़ारों में रौनक छाई, आया पर्व सुहावन है,
मकर संक्रांति का यह दिन, होता अति पावन है।
बेटे के मन में है मस्ती, उड़ानी उसे पतंग है,
रात भर जाग पढ़ लेगा वो, पढ़ाई का भी उमंग है।
मैंने कहा, “उड़ा लेना पतंग, पर बोर्ड परीक्षा पास है,”
बेटे ने भी मुस्कुरा कर कहा, “मम्मी, मुझे सब याद है।”
सुबह सवेरे जागकर हम, गंगाजल से स्नान करेंगे,
बाल्टी में ही संगम मान, पुण्य का आह्वान करेंगे।
तन शीतल और मन पावन हो, सूरज को अर्घ्य चढ़ाएं,
हाथ जोड़कर ईश्वर से हम, सबका कल्याण मनाएं।
पंडित जी को भोजन दें और, तिल-चावल का दान करें,
लड्डू गोपाल को पीला पहना, श्रद्धा से गुणगान करें।
आओ मिलकर लड्डू खाएं, बच्चों संग बच्चे बन जाएं,
रंग-बिरंगी पतंगों से, सारा आसमान सजाएं।
पर रखना ध्यान एक बात का, जब संध्या होने आए,
अपनी डोर तुम नीचे कर लो, पंछी घर को जाए।
तुम्हारी मांझे की उस धार से, कोई पंछी कट न जाए,
त्यौहार वही जो सबके जीवन में, बस खुशियां ही लाए।
हंसी-खुशी यह पर्व मने, बड़ों का लो आशीष,
मकर संक्रांति की शुभ घड़ी में, प्रभु को नवाओ शीश।
ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)

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