
ले मुझे अपनी शरण में, शारदे तू तार दे माँ ।
शब्द में हो भाव अनुपम, लेखनी में धार दे माँ ।।
भाव हो उतपन्न ऐसे, जो, जो जगत में मान पाये ।
कर सके जग में प्रसारित, तब जगत संज्ञान लाये ।।
स्वर प्रणव के गूँजते हो मन हृदय में तृप्ति भर दो,
नाम रोशन देश का हो, ज्ञान का भण्डार दे माँ ।
शब्द में हो भाव अनुपम, लेखनी में धार दे माँ ।। –
व्यावहारिक ज्ञान की इस,ज्योति की लौ को बढ़ाना ।
लोग शिक्षित हो रहें पर, स्वार्थ का पर्दा हटाना ।।
नित नये सपने सँजोता पा तुम्हारी प्रेरणा ही,
द्वंद सब मन से हटाकर, प्रेम का संचार दे माँ ।
शब्द में हो भाव अनुपम, लेखनी में धार दे माँ ।।
ईश की पूजा समझ श्रम साधना हो लक्ष्य मन का।
लक्ष्य अपने साधने को श्रम बने औजार तन का ।।
मन तरंगित हो रहा है नव्य स्वर दो कल्पना को,
परिश्रमी कहला सकूँ ये भाव का विस्तार दे माँ ।
शब्द में हो भाव अनुपम, लेखनी में धार दे माँ ।।
– लक्ष्मण लड़ीवाला ‘रामानुज’




