
फागुन आया है प्रियतम, सरसों ने ओढ़ा कंचन रंग,
धरती के अधरों पर सज उठा नव यौवन का ढंग।
मंद समीर ने छेड़ दिया जब बांसुरी का मधुर राग,
भीतर का सूखा वन भी गाने लगा प्रेम का फाग॥
टेसू ने जला दिए जैसे आकाश में अग्नि-कुसुम,
अमराई बोली,“प्रेम करो”, छोड़ो मन का हर विष-वृण।
कोयल की तान में घुलकर गूंजे मधुमास का गान,
हर सूनी डाली पर फिर से मुस्काया जीवन-प्राण॥
रंग नहीं केवल गालों पर,मन भी हो गुलाल,
द्वेष-दहन कर प्रेम रचो तुम, यही फाग का कमाल।
हाथों में हो हाथ सभी के, मिटे भेद का जाल,
रंगों से बढ़कर है अपना अपनापन का सवाल॥
आओ ऐसा रंग लगाएँ जो धो न सके संसार,
फागुन केवल ऋतु नहीं है, प्रेम-धर्म का द्वार।
सरसों की पीली मुस्कानें देतीं यही संदेश-
जीवन में रस भर दो ऐसे, हो हर दिन विशेष॥
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




