
ईंटों में पसीना बोता है, तब घर आकार में आता है,
मजदूर के श्रम से ही जग में, हर सपना सच हो पाता है।
धूप जले तो तन जलता है, फिर भी मुख पर हार नहीं,
उसके कदमों की थकन कहे—जीवन कोई त्यौहार नहीं।
रोटी की खातिर दिन ढलता, फिर भी हिम्मत टूटे ना,
जिसने जग को राह दिखाई, उसका मान कभी छूटे ना।
नमन उन्हें जिनके हाथों ने, दुनिया को आकार दिया,
मजदूर केवल नाम नहीं है, श्रम ने सारा संसार जिया।
अविनाश श्रीवास्तव
महराजगंज उत्तर प्रदेश




